काही हिंदी शिंपले … आणि … मोती

माझा हिंदी भाषेमधील लेख, विनोद वगैरेंचा संग्रह इथे पहा. http://anandjikapitara.blogspot.com/

काही हिंदी शिंपले …. आणि मोती

१. जिंदगी की अजीब कशमकश
२. आज का मोबाइल सच
३. चारुचंद्र की चंचल किरणें  .. चंचल चितवन
४. झाँकी ये विज्ञान की
५. … बहुत हैं
६. शराब
७. तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी – गुलजार
८. चार का चमत्कार
९. एक से दस का महिमा
१०. वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी
११. गुलजारसाहबकी कुछ अनमोल पंक्तियाँ
१२. ये जिंदगी है यारों – गुलजार ……..  २२-११-२०१९
१३. कुछ चुटकुले   ………. ०८-०२-२०२०
१४. आजके माहौलपर …  ३०-०३-२०२०, २०-०९-२०२०
१५.ख्वाहिश नहीं मुझे …. १९-०९-२०२०
१६. बचपनकी दीवाली – गुलजार   … २८-१०-२०२०
१७. अब हम छोटे हो गये  . . . . . . . . १८-०१-२०२१
१८. यह कैसा मुल्क है?  . . . . . .  १४-०४-२०२१
१९. लहरों से डर कर नौका    . . . . . १६-०४-२०२१
२०. दोस्तोंकी मेहफिल  . . . . . . . .  १७-०४-२०२१
२१. माँका पल्लू  . . . . . . . . . . . . . . १७-०४-२०२१
२२. कविता अ से ज्ञ तक . . . . . . . . ०३-०५-२०२१
२३. एक पनिहारिन और महाकवि कालिदास  . .  ०३-०५-२०२१
२४. बर्तन मांजते समय की सोच . . .  २४-०६-२०२१
२५. कागदहीपर . . .  . . . . . . . . . … २४-०६-२०२१
२६. मनुष्य के जीवन में 23 प्रश्न . . . . . २७-०६-२०२१
२७. कुछ  दिलचस्प चौपाइयाँ . . . . . .  १९-०७-२०२१
२८. दाढी . . .  काका हाथरसी  . . . . .  १८-९-२०२१
२९. कहाँपर बोलना है और कहाँ बोल जाते हैं .. २१-१०-२०२१
३०. ए जिंदगी बहुत हैरान हूं मैं।  . .  ३१-०५-२०२२
३१. कलजुगी दोहे  . . . . .    ०७-०६-२०२२
३२. ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं  . .  ०७-०६-२०२२

३१. कलजुगी दोहे

कुछ सुरेश मिश्र के कलियुगी दोहे भेज रहा हूं जरूर पढना और अपने दोस्तों को भी पढवाना
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निर्मल बाबा की कृपा,हो जाएं सब काम
थोडा सा नवनीत रख,थोडा झंडू बाम ।
मीठी बानी बोलिए,मन गद- गद होइ जाय
रोगी को बेहोश कर,किडनी लेउ चुराय
जीवन में मंगल नहीं,पर मंगल पर यान
भूख, कुपोषण,गरीबी, वा रे हिंदुस्तान ।
जिसे लगाना आ गया, लोगों को नवनीत
वो इस युग के सिकंदर, हर रण के रणजीत ।
मोटी कंठी पहिनि कर, धोइ रहे हैं पाप
बिना दवाई रो रहा, घर में बूढा बाप ।
आधे कपडे पहन कर,दिखा रहीं हर अंग
बोलो आशाराम जी,क्यों ना बदलें रंग ?
सीता-साबित्री हुईं,अब इस युग में मौन
हम सबकी आदर्श तो,हो गइ सनी लियोन ।
नेताजी को देखकर, गिरगिट हैं बेहाल
एक कला थी ले गए,’वो’ खादी के लाल ।
इस वाट्सप ने कर दिया, हम सबको बरबाद
कल तक जो कश्मीर थे,आज हुये धनबाद ।
भारत में चल रहा है,सब पैसों का खेल
‘भेल’ मिले दस मिनट में, पांच मिनट में ‘बेल’ ।
हर दिन मंदिर जा रहे, हर दिन देत अजान
भूखे बच्चे द्वार पर, त्याग रहे हैं जान ।
नेता बोलें “देश हित,में दे देंगे जान “
और अगर मौका मिले, बेचें हिंदुस्तान ।
अच्छे दिन की आस में, निर्धन हैं गमगीन
अपने’साहेब’ घूमते,फ्रांस,कनाडा,चीन ।
ओबामा ने कर दिया,’उनका’ जरा बखान
सीना छप्पन इंच का,हो गया ‘नील वितान ‘ ।
दाउद आ जा देश में जज पर कर एतबार
दो घंटे में बरी हो, मौज मना रे यार ।
पेप्सी,थम्सप ,कोक हैं, हर रोगों की खान
फिर भी इन पर मर रहा ,अक्खा हिंदुस्तान !!
नेता ऐसा चाहिये,जैसा सूप सुभाय
सार-सार खुद गहि रहे,थोथा देइ लुटाय ।
काम नहीं कुछ कीजिए,करते रहो विवाद
जनता मिस्टर क्लीन-सा ,तुम्हे रखेगी याद
बिजली, पानी या सडक शिक्षा,स्वास्थ्य निदान
केंद्र नहीं दे रहा तो,कैसे दें श्रीमान ।
थोडी भी नवनीत यदि, होती मेरे पास
‘पदम श्री’ लेता तुरत, मैं भी बनता खास ।
‘लिटरेचर’ के मसखरे,घूमें देश-विदेश
कविता लिखकर गली में,खोए रहे सुरेश ।
संस्कार के नाम पर ,खूब हो रहे काम
रामपाल पैदा हुए,जन्मे आशाराम ।
तुलसीदास विलखि रहे,सूरदास मतिमंद
मटकि रही हैं गोपियां, साथ अच्युदानंद ।
बाबा, योगी,ऋषि ,मुनी,साधू,संत,महंत
भूल गए तप देखकर, सब राखी सावंत ।
मर्यादा की भूमि थी,संस्कार का देश
पाश्चात्य में बह गया,कैसे भला सुरेश !!
सुरेश मिश्र
09869141831
09619872154
प्लीज ,
अगर पसंद आएं तो शेअर करें मगर मेरा नाम और नम्बर न मिटाएं।
ये मेरे मौलिक दोहे हैं। आदरणीय बाला साहब ठाकरे के अखबार’सामना’ में आज प्रकाशित हुए हैं वहां भी पढ सकते हैं

३२. ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नही।

अपने दिल की किसी हसरत का पता देते हैं
मेरे बारे में जो अफ़वाह उड़ा देते हैं

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं

इतने हिस्सों में बंट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं

ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं

जिसके कारण फ़साद होते हैं
उसका कोई अता-पता ही नहीं

कैसे अवतार कैसे पैग़मबर
ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं

ज़िंदगी की तल्ख़ियाँ अब कौन सी मंज़िला पाएं
इससे अंदाज़ा लगा लो ज़हर महँगा हो गया

ज़िंदगी अब बता कहाँ जाएँ
ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं

सच घटे या बढ़े तो सच ना रहे
झूठ की कोई इँतहा ही नहीं

धन के हाथों बिके हैं सब क़ानून
अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं

चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो
आईना झूठ बोलता ही नहीं

अपनी रचनाओं में वो ज़िन्दा है
‘नूर’ संसार से गया ही नहीं

 कृष्ण बिहारी ‘नूर’

शायर कृष्ण बिहारी नूर ने इस ग़ज़ल को मुशायरे में पेश किया, वीडियो देखें –

https://www.youtube.com/embed/WgT033R74k4

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२०. दोस्तों की महफ़िल

जहाँ बेपरवाह हंसी के ठहाके सुनाई दें
समझ लेना दोस्तों की महफ़िल जमी है

जहाँ रत्ती भर भी मनभेद न दिखाई दे
समझ लेना दोस्तों की महफ़िल जमी है

जहाँ गुज़रे वक़्त की आवाज़ सुनाई दें
समझ लेना दोस्तों की महफ़िल जमी है

जहाँ हर राज़ बेधड़क खुलते दिखाई दें
समझ लेना दोस्तों की महफ़िल जमी है

जहाँ पीने के बाद खूब अंग्रेजी सुनाई दे
समझ लेना दोस्तों की महफ़िल जमी है

जहाँ ख़ुशी में हर कोई झूमता दिखाई दे
समझ लेना दोस्तों की महफ़िल जमी है

जहाँ पुराने प्यार के चर्चे छिड़ते सुनाई दे
समझ लेना दोस्तों की महफ़िल जमी है

आंखे भीगे भी नहीं और नमी दिखाई दे
समझ लेना दोस्तों की महफ़िल जमी है

सालों बाद फिर मिलने के वादे सुनाई दें
समझ लेना दोस्तों की महफ़िल जमी है
🙏🙏

ये दोस्ती का बंधन भी
बडा अजीब है…
मिल जाए तो बातें लंबी….
बिछड जाए तो यादें लंबी….

२१. माँ का पल्लू

🌹 माँ का पल्लू अनमोल 🌹

मुझे नही लगता कि आज के बच्चे यह जानते हो कि
पल्लू क्या होता है ?
पल्लू बीते समय की बात हो चुकी है।
माँ के पल्लू का सिद्धाँत ,
माँ को गरिमामयी छवि प्रदान करने के लिए था।
पल्लू की बात ही निराली थी।
पल्लू पर तो बहुत कुछ
लिखा और कहा जा सकता है।
पल्लू बच्चों का पसीना – आँसू पोंछने,
गंदे नाक – कान, मुँह की सफाई के लिए ,
सिर भीना होने पर पोंछने और
धूप से बचाने के लिए भी
उपयोग किया जाता था।
पल्लू एप्रेन का काम भी करता था,
माँ इसको अपना हाथ पोंछने के लिए
तौलिया के रूप में भी उपयोग कर लेती थी।
खाना खाने के बाद ,
पल्लू से मुँह साफ करने का
अपना ही आनंद होता था।
गरम बर्तन को चुल्हे से हटाने के लिए भी
माँ का पल्लू ही काम आता था ।
जब कभी आँख मे दर्द हो ,
माँ अपने
पल्लू को गोल बनाकर ,
फूंक मारकर ,गरम करके पलकों पर रख देती थी,
तो दर्द उसी समय गायब हो जाता था।
माँ की गोद में सोने वाले बच्चों के लिए
उसकी गोद ,गद्दा और उसका
पल्लू ,चादर का काम करता था।
जब भी कोई अंजान घर पर आता , तो बच्चा उसको
माँ के पल्लू की ओट लेकर देखता था।
जब भी बच्चे को किसी बात पर शर्म आती
या डर लगता तब वह
पल्लू में ही अपना सिर छुपा लेता था।
माँ का पल्लू गर्मी में पंखे का काम करता था।
पल्लू ही बालक के शरीर से मक्खि – मच्छर ,
उड़ाने का काम भी करता था ।
बच्चों को जब बाहर जाना होता था , तब
‘माँ का पल्लू’ एक मार्गदर्शक का काम करता था।
अपनी बात मनवाने के लिए बच्चा
माँ का पल्लू खिंचकर ज़िद पुरी करता था।
मेहनत के समय मां अपने
पल्लू को कसकर बांध लेती थी ।
जब तक बच्चे ने हाथ में
पल्लू थाम रखा होता था ,
तो सारी कायनात उसकी मुट्ठी में होती थी।
माँ के पल्लू में सुगंध ,ममता और अपनेपन का भाव था।
जब मौसम ठंडा होता था ,
माँ उसके
पल्लू को अपने
चारों और लपेट कर अपने को
ठंड से बचाने की कोशिश करती और
जब बारिश होती,माँ अपने
पल्लू से अपना सिर ढँक लेती थी ।
पल्लू का उपयोग पेड़ों से गिरने वाले
जामुन ,बेर ,मीठे फल और सुगंधित फूलों को
लाने के लिए किया जाता था।
पल्लू में धान, दान, प्रसाद भी संकलित किया जाता था।
पल्लू घर में रखे समान से
धूल हटाने में भी बहुत सहायक होता था।
कभी कोई वस्तु खो जाए ,
तो माँ की मानता के अनुसार
पल्लू में गांठ लगाकर वह निश्चिंत हो जाती थी कि
अब जल्द मिल जाएगी।
किसी बात को स्मरण करने के लिए और
कसम खाने के लिए भी
पल्लू में गांठ बांधी जाती थी ।
पल्लू में गाँठ लगा कर माँ
एक चलता फिरता बैंक या
तिजोरी रखती थी और अगर
सब कुछ ठीक रहा, तो कभी- कभी
उस बैंक से कुछ पैसे भी मिल जाते थे।
माँ के पल्लू ने मां की भीगी अंखियां भी पोंछी है ।
माँ ने बच्चों के दु:ख के समय में अपना
पल्लू फैलाकर ईश्वर से
उनके सुख की मिन्नत की है ।
माँ का पल्लू बालक का रक्षा कवच है ।
माँ का पल्लू एक , सेवा – काम – लाभ अनेक थे ।
माँ के पल्लू में सुखद अनुभूति है ।
मुझे नहीं लगता कि विज्ञान
कितनी भी तरक्की करने के बाद भी
माँ के पल्लू का विकल्प ढूँढ पाये।
पल्लू कुछ और नही अपितु
एक जादुई अनुभूति है।
माँ के पल्लू में स्नेह , सेवा और समर्पण है

सभी माताओं को समर्पित

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२२. कविता अ से ज्ञ तक

यह कविता प्रशंसनीय है।
हिन्दी वर्णमाला का क्रम से कवितामय प्रयोग-बेहतरीन है।

*अ* चानक
*आ* कर मुझसे
*इ* ठलाता हुआ पंछी बोला
*ई* श्वर ने मानव को तो
*उ* त्तम ज्ञान-दान से तौला
*ऊ* पर हो तुम सब जीवों में
*ऋ* ष्य तुल्य अनमोल
*ए* क अकेली जात अनोखी
*ऐ* सी क्या मजबूरी तुमको
*ओ* ट रहे होंठों की शोख़ी
*औ* र सताकर कमज़ोरों को
*अं* ग तुम्हारा खिल जाता है
*अ:* तुम्हें क्या मिल जाता है.?
*क* हा मैंने- कि कहो
*ख* ग आज सम्पूर्ण
*ग* र्व से कि- हर अभाव में भी
*घ* र तुम्हारा बड़े मजे से
*च* ल रहा है
*छो* टी सी- टहनी के सिरे की
*ज* गह में, बिना किसी
*झ* गड़े के, ना ही किसी
*ट* कराव के पूरा कुनबा पल रहा है
*ठौ* र यहीं है उसमें
*डा* ली-डाली, पत्ते-पत्ते
*ढ* लता सूरज
*त* रावट देता है
*थ* कावट सारी, पूरे
*दि* वस की-तारों की लड़ियों से
*ध* न-धान्य की लिखावट लेता है
*ना* दान-नियति से अनजान अरे
*प्र* गतिशील मानव
*फ़* रेब के पुतलों
*ब* न बैठे हो समर्थ
*भ* ला याद कहाँ तुम्हें
*म* नुष्यता का अर्थ?
*य* ह जो थी, प्रभु की
*र* चना अनुपम…
*ला* लच-लोभ के
*व* शीभूत होकर
*श* र्म-धर्म सब तजकर
*ष* ड्यंत्रों के खेतों में
*स* दा पाप-बीजों को बोकर
*हो* कर स्वयं से दूर
*क्ष* णभंगुर सुख में अटक चुके हो
*त्रा* स को आमंत्रित करते
*ज्ञा* न-पथ से भटक चुके हो।

🕯️🕯️🕯️
अंग्रेजी के अल्फाबेट्स पर बहुत कुछ पढ़ा होगा पहली बार हिंदी में👍

२३. एक पनिहारिन और महाकवि कालिदास

महाकवि कालिदास रास्ते में थे। प्यास लगी। वहां एक पनिहारिन पानी भर रही थी।
कालिदास बोले , माते ! पानी पिला दीजिए बड़ा पुण्य होगा।
पनिहारिन बोली,”बेटा ! मैं तुम्हें जानती नहीं। अपना परिचय दो। मैं पानी पिला दूंगी।
कालिदास ने कहा ,”मैं मेहमान हूं, कृपया पानी पिला दें।”
पनिहारिन बोली ,”तुम मेहमान कैसे हो सकते हो? संसार में दो ही मेहमान हैं- पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम?”
(तर्क से पराजित कालिदास अवाक् रह गए।)
कालिदास बोले ,”मैं सहनशील हूं, अब आप पानी पिला दें।”
पनिहारिन ने कहा ,”नहीं, सहनशील तो दो ही हैं- पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है, उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है, दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो?”
(कालिदास मूर्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्ला उठे।)
कालिदास बोले ,”मैं हठी हूं।”
पनिहारिन बोली ,”फिर असत्य। हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो, बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें कौन हैं आप?”
(कालिदास अपमानित और पराजित हो चुके थे)
कालिदास ने कहा ,”फिर तो मैं मूर्ख ही हूं।”
पनिहारिन ने कहा ,”नहीं, तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो? मूर्ख दो ही हैं- पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए गलत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।”
(कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा पनिहारिन के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे)
वृद्धा ने कहा ,”उठो वत्स!”
(आवाज सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थीं, कालिदास पुन: नतमस्तक हो गए)
मां ने कहा ,”शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार से। तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठा इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा।”
कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

🚩🚩सीख : विद्वता पर कभी घमंड न करें। घमंड विद्वता को नष्ट कर देता है। अतः विद्वान नहीं विद्यावान बनें।
दो चीजों को कभी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए- अन्न के कण और आनंद के क्षण ।


२४. बर्तन माँजते समय … 

इंजीनियर, डाक्टर, चार्टड अकाउंटेंट, वकील या कोई और, इस लॉक डाउन में सभी नित्य बर्तन माँज रहे हैं।
और बर्तन माँजते समय अपने अपने पेशे के हिसाब से सोच रहे हैं।
😛😊
इंजीनियर की सोच-
ताम्बे और स्टील के बर्तन माँजना थोड़ा आसान हैं, ये प्लास्टिक के बर्तन तो साले तेल पीते हैं। चिकनाई छूटती ही नहीं। और ये काँच के बर्तन, हाथ से फिसल फिसल कर जाते हैं, अब तक १४ तो टूट चुके हैं। कितनी बार पत्नी को कहा कि धातू के बर्तन काम लिया करे लेकिन नहीं। कहती हैं काँच में क्लास हैं और टूट जाये तो मेरी क्लास हैं।

डाक्टर की सोच-
अरे बाप रे, इतनी चिकनाई खाते हैं हम लोग, ये तो ब्लड प्रेशर को आमंत्रण हैं। और ये क्या, सुबह शाम आईसक्रीम? अरी सुनती हो, बच्चों के दाँत ख़राब करने हैं? और ये, सब्ज़ियों को तो सब झूठा ही डाल रहें हैं। हैल्थ ख़राब करके ही मानेंगे।

चार्टड अकाउंटेंट की सोच-
समझ में नहीं आता इतने बर्तन कैसे हो जाते हैं? घर में दिनभर में तीन बार चाय बनी थी तो ये चाय की ५ भगौनिया कैसे हो गयी? और ये तवा, इसे तो दिन भर में एक बार माँजना चाहिये, ये दोनों समय सिंक में कैसे आ जाता हैं। गंदे चम्मच तो देखो, लगता हैं बारात जीम कर गयी हैं। कुछ नियम बनाना पड़ेगा, आज के बाद एक सदस्य दिन भर में एक ही चम्मच काम लेगा।

वकील की सोच-
केस करूँगा केस, कोर्ट में घसीटूँगा सालो को। झूठे विज्ञापन देते हैं। ये घड़ी डिश वाशिंग पाउडर वाले कहते हैं, चुटकी भर लगाओ, बर्तन काँच से चमकाओ। पाव भर पाउडर लग गया और बर्तन चिकने के चिकने। और ये हाथी डिश वाशिंग पाउडर? कहते हैं, मुलायम त्वचा का साथी, डिश वाशिंग पाउडर हाथी। तीन महिने में हथेलियाँ तीस साल आगे चली गयी हैं। सब को कोर्ट ले जाऊँगा।


२५.कागदहीपर

एक बार एक कवि हलवाई की दुकान पहुंचे, जलेबी और दही ली और वहीं खाने बैठ गये। इतने में एक कौआ कहीं से आया और दही की परात में चोंच मारकर उड़ चला। हलवाई को बड़ा गुस्सा आया उसने पत्थर उठाया और कौए को दे मारा। कौए की किस्मत ख़राब, पत्थर सीधे उसे लगा और वो मर गया।

– ये घटना देख कवि हृदय जगा । वो जलेबी खाने के बाद पानी पीने पहुंचे तो उन्होने एक कोयले के टुकड़े से वहां एक पंक्ति लिख दी।
“काग दही पर जान गँवायो”
तभी वहां एक लेखपाल महोदय जो कागजों में हेराफेरी की वजह से निलम्बित हो गये थे, पानी पीने आए। कवि की लिखी पंक्तियों पर जब उनकी नजर पड़ी तो अनायास ही उनके मुंह से निकल पड़ा , कितनी सही बात लिखी है! क्योंकि उन्होने उसे कुछ इस तरह पढ़ा-
“कागद ही पर जान गंवायो”
तभी एक मजनू टाइप लड़का पिटा-पिटाया सा वहां पानी पीने आया। उसे भी लगा कितनी सच्ची बात लिखी है काश उसे ये पहले पता होती, क्योंकि उसने उसे कुछ यूं पढ़ा था-
“का गदही पर जान गंवायो”

शायद इसीलिए तुलसीदास जी ने बहुत पहले ही लिख दिया था, “जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी”👆👆👆

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२६. मनुष्य के जीवन में 23 प्रश्न

व्हाट्सएप के द्वारा मेरे पास बहुत से ग्रुपों से एवं अन्य जितने भी मैसेज आते हैं उन सभी मैसेजों में सबसे श्रेष्ठतम मैसेज मैं आपको शेयर कर रहा हूं अपना “अमूल्य समय” निकाल कर इस मैसेज को पूरा पढ़ें इस मैसेज में मनुष्य के जीवन में 23 प्रश्न हमेशा कभी ना कभी हर व्यक्ति के मस्तिष्क में आते रहते हैं उन्हीं प्रश्नों का बहुत ही सुंदर एवं संक्षिप्त उत्तर इस मैसेज में दिया गया है आप स्वयं इन प्रश्नों के उत्तरों से परिचित हों…

Qus→1- जीवन का उद्देश्य क्या है ?
Ans→ जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है – जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। उसे जानना ही मोक्ष है..!

Qus→2- जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है ?
Ans→ जिसने स्वयं को, उस आत्मा को जान लिया – वह जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है..!

Qus-3-संसार में दुःख क्यों है ?
Ans→लालच, स्वार्थ और भय ही संसार के दुःख का मुख्य कारण हैं..!

Qus→4- ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की ?
Ans→ ईश्वर ने संसार की रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की..!

Qus→5- क्या ईश्वर है ? कौन है वे ? क्या रुप है उनका ? क्या वह स्त्री है या पुरुष ?
Ans→ कारण के बिना कार्य नहीं। यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है। तुम हो, इसलिए वे भी है – उस महान कारण को ही आध्यात्म में ‘ईश्वर‘ कहा गया है। वह न स्त्री है और ना ही पुरुष..!

Qus→6- भाग्य क्या है ?
Ans→हर क्रिया, हर कार्य का एक परिणाम है। परिणाम अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। यह परिणाम ही भाग्य है तथा आज का प्रयत्न ही कल का भाग्य है..!

Qus→7- इस जगत में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?
Ans→ रोज़ हजारों-लाखों लोग मरते हैं और उसे सभी देखते भी हैं, फिर भी सभी को अनंत-काल तक जीते रहने की इच्छा होती है..
इससे बड़ा आश्चर्य ओर क्या हो सकता है..!

Qus→8-किस चीज को गंवाकर मनुष्य धनी बनता है?
Ans→ लोभ..!

Qus→9- कौन सा एकमात्र उपाय है जिससे जीवन सुखी हो जाता है?
Ans → अच्छा स्वभाव ही सुखी होने का उपाय है..!

Qus →10- किस चीज़ के खो जाने पर दुःख नहीं होता?
Ans → क्रोध..!

Qus→11- धर्म से बढ़कर संसार में और क्या है ?
Ans → दया..!

Qus→12-क्या चीज़ दुसरो को नहीं देनी चाहिए ?
Ans→ तकलीफें, धोखा..!

Qus→13- क्या चीज़ है, जो दूसरों से कभी भी नहीं लेनी चाहिए ?
Ans→ इज़्ज़त, किसी की हाय..!

Qus→14- ऐसी चीज़ जो जीवों से सब कुछ करवा सकती है ?
Ans→मज़बूरी..!

Qus→15- दुनियां की अपराजित चीज़ ?
Ans→ सत्य..!

Qus→16- दुनियां में सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ ?
Ans→ झूठ..!

Qus→17- करने लायक सुकून का कार्य ?
Ans→ परोपकार..!

Qus→18- दुनियां की सबसे बुरी लत ?
Ans→ मोह..!

Qus→19- दुनियां का स्वर्णिम स्वप्न ?
Ans→ जिंदगी..!

Qus→20- दुनियां की अपरिवर्तनशील चीज़ ?
Ans→ मौत..!

Qus→21- ऐसी चीज़ जो स्वयं के भी समझ ना आये?Ans→ अपनी मूर्खता..!

Qus→22 दुनियां में कभी भी नष्ट/ नश्वर न होने वाली चीज़ ?
Ans→आत्मा और ज्ञान..!

Qus→23- कभी न थमने वाली चीज़ ?
Ans→ समय..!

मैं स्वयं भी उपरोक्त प्रश्नों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास कर रहा हूं । कहां तक सार्थक रहूंगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा आप भी एक बार प्रयास करके आवश्यक रूप से देखें।🙏🏻🙏🏻

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२७. कुछ दिलचस्प चौपाइयाँ

1 कभी साथ बैठो….. तो कहूँ कि दर्द क्या है…
अब यूँ दूर से पूछोगे…… तो ख़ैरियत ही कहेंगे…
2. सुख मेरा काँच सा था.. … न जाने कितनों को चुभ गया..!
3. आईना आज फिर रिशवत लेता पकड़ा गया..
दिल में दर्द था और चेहरा हंसता हुआ पकड़ा गया…
4. वक्त, ऐतबार और इज्जत, ऐसे परिंदे हैं..
जो एक बार उड़ जायें तो वापस नहीं आते…
5. दुनिया तो एक ही है, … फिर भी सबकी अलग है…
6. दरख्तों से रिश्तों का हुनर सीख लो मेरे दोस्त..
जब जड़ों में ज़ख्म लगते हैं, तो टहनियाँ भी सूख जाती हैं
7. कुछ रिश्ते हैं, …. …इसलिये चुप हैं ।
कुछ चुप हैं, …. …इसलिये रिश्ते हैं ।।
8. मोहब्बत और मौत की पसंद तो देखिए..
एक को दिल चाहिए, और दूसरे को धड़कन…
9. जब जब तुम्हारा हौसला आसमान में जायेगा..
सावधान, तब तब कोई पंख काटने जरूर आयेगा…
10. हज़ार जवाबों से अच्छी है ख़ामोशी साहेब..
ना जाने कितने सवालों की आबरू तो रखती है…

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२८. दाढी 

‘काका’ दाढ़ी राखिए, बिन दाढ़ी मुख सून
ज्यों मंसूरी के बिना, व्यर्थ देहरादून
व्यर्थ देहरादून, इसी से नर की शोभा
दाढ़ी से ही प्रगति कर गए संत बिनोवा
मुनि वसिष्ठ यदि दाढ़ी मुंह पर नहीं रखाते
तो भगवान राम के क्या वे गुरू बन जाते?
शेक्सपियर, बर्नार्ड शॉ, टाल्सटॉय, टैगोर
लेनिन, लिंकन बन गए जनता के सिरमौर
जनता के सिरमौर, यही निष्कर्ष निकाला
दाढ़ी थी, इसलिए महाकवि हुए ‘निराला’
कहं ‘काका’, नारी सुंदर लगती साड़ी से
उसी भांति नर की शोभा होती दाढ़ी से।
~ पद्मश्री काका हाथरसी

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२९. कहाँ पर बोलना है

*कहाँ पर बोलना है*
*और कहाँ पर बोल जाते हैं।*
*जहाँ खामोश रहना है*
*वहाँ मुँह खोल जाते हैं।।*

*कटा जब शीश सैनिक का*
*तो हम खामोश रहते हैं।*
*कटा एक सीन पिक्चर का*
*तो सारे बोल जाते हैं।।*

*नयी नस्लों के ये बच्चे*
*जमाने भर की सुनते हैं।*
*मगर माँ बाप कुछ बोले*
*तो बच्चे बोल जाते हैं।।*

*बहुत ऊँची दुकानों में*
*कटाते जेब सब अपनी।*
*मगर मज़दूर माँगेगा*
*तो सिक्के बोल जाते हैं।।*

*हवाओं की तबाही को*
*सभी चुपचाप सहते हैं।*
*च़रागों से हुई गलती*
*तो सारे बोल जाते हैं।।*

*बनाते फिरते हैं रिश्ते*
*जमाने भर से अक्सर हम*
*मगर घर में जरूरत हो*
*तो रिश्ते भूल जाते हैं।।*

*कहाँ पर बोलना है*
*और कहाँ पर बोल जाते हैं*
*जहाँ खामोश रहना है*
*वहाँ मुँह खोल जाते हैं।।*

*यह कविता बार बार पढ़े।आपको हर बार एक नया अहसास होगा।*

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३०. ए जिंदगी बहुत हैरान हूं मैं।

एक कविता मौके पर पेश है

ए जिंदगी बहुत हैरान हूं मैं।
कभी उलझनों को सुलझाने से,
तो कभी खुद ही में उलझ जाने से,
परेशान हूं मैं, ऐ ज़िन्दगी बहुत हैरान हूं मैं।
कभी दूसरों के हराने से,
तो कभी खुद से ही हार जाने से,
परेशान हूं मैं, ऐ ज़िन्दगी बहुत हैरान हूं मैं।
कभी लोगों की मतलबी बातों से,
तो कभी खुद भी मतलबी हो जाने से,
परेशान हूं मैं, ऐ ज़िन्दगी बहुत हैरान हूं मैं।
कभी भूख के न मिट पाने से,
तो कभी भूख ही ना आने से,
परेशान हूं मैं, ऐ ज़िन्दगी बहुत हैरान हूं मैं।
कभी नींद के ना आने से,
तो कभी ख्वाबों के टूट जाने से,
परेशान हूं मैं, ऐ ज़िन्दगी बहुत हैरान हूं मैं।
कभी दिल के टूट जाने से,
तो कभी अपनों के रुठ जाने से,
परेशान हूं मैं, ऐ ज़िन्दगी बहुत हैरान हूं मैं-बहुत हैरान हूं मैं।।

– मनोज कुमार सूर्यवंशी

 

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१९.लहरों से डर कर नौका

ही सुंदर कविता ही कविता गालिब, जावेद अख्तर, हरिवंशराय बच्चन, गुलजार, अटलजी वगैरेंच्या नावावर शेअर केली आहे. कुणी मूळ कवी सूर्यकांत त्रिपाठी निराला यांचे नाव दिले आहे तर कुणी ती सोहनलाल द्विवेदी यांची आहे असे सांगितले आहे.

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती…
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती…
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती…
असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती…

१८. यह कैसा मुल्क है

*एक व्यंग हैं , जिसने भी लिखा है, बहुत शानदार लिखा है।*

💮 *यह नदियों का मुल्क है,*
*पानी भी भरपूर है।*
*बोतल में बिकता है,*
*बीस रू शुल्क है।*

💮 *यह गरीबों का मुल्क है,*
*जनसंख्या भी भरपूर है।*
*परिवार नियोजन मानते नहीं,*
*जबकि नसबन्दी नि:शुल्क है।*

💮 *यह अजीब मुल्क है,*
*निर्बलों पर हर शुल्क है।*
*अगर आप हों बाहुबली,*
*हर सुविधा नि:शुल्क है।*

💮 *यह अपना ही मुल्क है,*
*कर कुछ सकते नहीं।*
*कह कुछ सकते नहीं,*
*जबकि बोलना नि:शुल्क है।*

💮 *यह शादियों का मुल्क है,*
*दान दहेज भी खूब हैं।*
*शादी करने को पैसा नहीं,*
*जबकि कोर्ट मैरिज नि:शुल्क हैं।*

💮 *यह पर्यटन का मुल्क है,*
*बस/रेलें भी खूब हैं।*
*बिना टिकट पकड़े गए तो,*
*रोटी कपड़ा नि:शुल्क है।*

💮 *यह अजीब मुल्क है,*
*हर जरूरत पर शुल्क है।*
*ढूंढ कर देते हैं लोग,*
*पर सलाह नि:शुल्क है।*

💮 *यह आवाम का मुल्क है,*
*रहकर चुनने का हक है।*
*वोट देने जाते नहीं,*
*जबकि मतदान नि:शुल्क है।*

💮 *:बेचारा आदमी:*
*जब सर के बाल न आये तो* *दवाई ढूँढता है..,*
*जब आ जाते है तो नाई ढूँढता है..,*
*और जब काले रहते हैं तो लुगाई ढूँढता है ।*
*जब सफ़ेद हो जाते है तो फिर डाई ढूँढता है…!*

😀😀 😀😀
*मुस्कुराईये नि:शुल्क है।*

गुलजार वचन

१७. अब हम छोटे हो गये

अब हम छोटे हो गए!!
अब हम छोटे हो गए
क्योंकि हमारे बच्चे बड़े हो गए
ऐसा मत करो,वैसा मत करो
ये खाया करो,वो खाया करो
दिन भर टीवी मत देखो
आखों पर असर पड़ेगा
कभी आँगन में ही घूम लिया करो
बच्चों से ही सीख लिया करो
अब हम बच्चे हो गए
क्योंकि बच्चे हमारे बड़े हो गए
अब तुम्हारी उम्र बढ़ रही है,
बचपना छोड़ो,समझदारी की बातें किया करो ! !
कहा जाता है हमको,
हम भी हॉ में हॉ मिलाते,जैसे सब सीख गए! !
अब हम छोटे हो गए
क्योकि बच्चे हमारे बड़े हो गए! !

जो काम कर पाओ वही किया करो
जब नहीं बनता तो किया ही मत करो
किसी से कह दिया करो
अभी यह सब करने की उम्र नहीं है तुम्हारी !
कही चोट लग गई तो क्या होगा?
बिन बात के आफ़त आ जायेगी
अब हम छोटे हो गए
क्योकि बच्चे हमारे बड़े हो गए!!!
खीज जाते है कभी कभी
ज़िद में रूठ जाते है,पर जल्दी ही मान भी जाते है
मीठा देख ललचा जाते हैं!!
क्या करें जाएं भी कहॉ, अपने तो अपने ही होते है!
यह सोच फिर जुट जाते है
क्योंकि अब हम छोटे हो गए
और बच्चे हमारे बड़े हो गए! !!!!!
🌹🌹✍️🌹🌹

१६. नवी भर : बचपनकी  दिवाली

बचपन की दिवाली पर गुलजार साहब की लिखी यह पुरानी कविता है।।

अब चूने में नील मिलाकर पुताई का जमाना नहीं रहा।  चवन्नी, अठन्नी का जमाना भी नहीं रहा।
फिर भी यह कविता आप सब के लिए पेश है–

हफ्तों पहले से साफ़-सफाई में जुट जाते हैं,
चूने के कनिस्तर में थोड़ी नील मिलाते हैं,
अलमारी खिसका खोयी चीज़ वापस पाते हैं,
दोछत्ती का कबाड़ बेच कुछ पैसे कमाते हैं,
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं …

दौड़-भाग के घर का हर सामान लाते हैं,
चवन्नी-अठन्नी पटाखों के लिए बचाते हैं,
सजी बाज़ार की रौनक देखने जाते हैं,
सिर्फ दाम पूछने के लिए चीजों को उठाते हैं,
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं …

बिजली की झालर छत से लटकाते हैं,
कुछ में मास्टर बल्ब भी लगाते हैं,
टेस्टर लिए पूरे इलेक्ट्रीशियन बन जाते हैं,
दो-चार बिजली के झटके भी खाते हैं,
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं …

दूर थोक की दुकान से पटाखे लाते है,
मुर्गा ब्रांड हर पैकेट में खोजते जाते है,
दो दिन तक उन्हें छत की धूप में सुखाते हैं,
बार-बार बस गिनते जाते है
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं …

धनतेरस के दिन कटोरदान लाते है,
छत के जंगले से कंडील लटकाते हैं,
मिठाई के ऊपर लगे काजू-बादाम खाते हैं,
प्रसाद की थाली पड़ोस में देने जाते हैं,
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ….
अन्नकूट के लिए सब्जियों का ढेर लगाते है,
भैया-दूज के दिन दीदी से आशीर्वाद पाते हैं,
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं …

दिवाली बीत जाने पे दुखी हो जाते हैं,
कुछ न फूटे पटाखों का बारूद जलाते हैं,
घर की छत पे दगे हुए राकेट पाते हैं,
बुझे दीयों को मुंडेर से हटाते हैं,
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं …

बूढ़े माँ-बाप का एकाकीपन मिटाते हैं,
वहीं पुरानी रौनक फिर से लाते हैं,
सामान से नहीं, समय देकर सम्मान जताते हैं,
उनके पुराने सुने किस्से फिर से सुनते जाते हैं,
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं …
🌹🙏

१५. ख्वाहिश नहीं मुझे

*हरिवंशराय बच्चन जी की एक सुंदर कविता, जिसके एक-एक शब्द को बार-बार पढ़ने को मन करता है-_*
_ख्वाहिश नहीं मुझे_
_मशहूर होने की,”_
_आप मुझे पहचानते हो_
_बस इतना ही काफी है।_
_अच्छे ने अच्छा और_
_बुरे ने बुरा जाना मुझे,_
_जिसकी जितनी जरूरत थी_
_उसने उतना ही पहचाना मुझे!_
_जिन्दगी का फलसफा भी_
_कितना अजीब है,_
_शामें कटती नहीं और_
_साल गुजरते चले जा रहे हैं!_
_एक अजीब सी_
_’दौड़’ है ये जिन्दगी,_
_जीत जाओ तो कई_
_अपने पीछे छूट जाते हैं और_
_हार जाओ तो_
_अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं!_
_बैठ जाता हूँ_
_मिट्टी पे अक्सर,_
_मुझे अपनी_
_औकात अच्छी लगती है।_
_मैंने समंदर से_
_सीखा है जीने का सलीका,_
_चुपचाप से बहना और_
_अपनी मौज में रहना।_
_ऐसा नहीं कि मुझमें_
_कोई ऐब नहीं है,_
_पर सच कहता हूँ_
_मुझमें कोई फरेब नहीं है।_
_जल जाते हैं मेरे अंदाज से_
_मेरे दुश्मन,_
_एक मुद्दत से मैंने_
_न तो मोहब्बत बदली_
_और न ही दोस्त बदले हैं।_
_एक घड़ी खरीदकर_
_हाथ में क्या बाँध ली,_
_वक्त पीछे ही_
_पड़ गया मेरे!_
_सोचा था घर बनाकर_
_बैठूँगा सुकून से,_
_पर घर की जरूरतों ने_
_मुसाफिर बना डाला मुझे!_
_जीवन की भागदौड़ में_
_क्यूँ वक्त के साथ रंगत खो जाती है ?_
_हँसती-खेलती जिन्दगी भी_
_आम हो जाती है!_
_एक सबेरा था_
_जब हँसकर उठते थे हम,_
_और आज कई बार बिना मुस्कुराए_
_ही शाम हो जाती है!_
_कितने दूर निकल गए_
_रिश्तों को निभाते-निभाते,_
_खुद को खो दिया हमने_
_अपनों को पाते-पाते।_
_लोग कहते हैं_
_हम मुस्कुराते बहुत हैं,_
_और हम थक गए_
_दर्द छुपाते-छुपाते!_
_खुश हूँ और सबको_
_खुश रखता हूँ,_
_लापरवाह हूँ ख़ुद के लिए_
_मगर सबकी परवाह करता हूँ।_
_मालूम है_
_कोई मोल नहीं है मेरा फिर भी
_कुछ अनमोल लोगों से_
_रिश्ते रखता हूँ।_

१४  आजके माहौलपर

*आज के माहौल पर एक ग़ज़ल पेशे ख़िदमत है…….*

बेवजह घर से निकलने की ज़रूरत क्या है |
*मौत से आंख मिलाने की ज़रूरत क्या है |*

सबको मालूम है बाहर की हवा है क़ातिल |
*यूँ ही क़ातिल से उलझने की ज़रूरत क्या है ||*

ज़िन्दगी एक नियामत, इसे सम्हाल के रख |
*क़ब्रगाहों को सजाने की ज़रूरत क्या है ||*

दिल बहलने के लिए घर मे वजह हैँ काफ़ी |
*यूँ ही गलियों मे भटकने की ज़रूरत क्या है ||*

मुस्कुराकर, आंख झुकना भी अदब होता है |
*हाथ से हाथ मिलाने की ज़रूरत क्या है ||*

श्रेयांसकुमार जैन द्वारा प्रेषित

गुलजार जरूरत क्या है

🙏🙏

हरिवंश राय जी की प्रसिद्ध पंक्तियों की प्रेरणा से आज के परिपेक्ष्य में आप सभी से निवेदन,,,,

शत्रु ये अदृश्य है
विनाश इसका लक्ष्य है
कर न भूल, तू जरा भी ना फिसल
मत निकल, मत निकल, मत निकल

हिला रखा है विश्व को
रुला रखा है विश्व को
फूंक कर बढ़ा कदम, जरा संभल
मत निकल, मत निकल, मत निकल

उठा जो एक गलत कदम
कितनों का घुटेगा दम
तेरी जरा सी भूल से, देश जाएगा दहल
मत निकल, मत निकल, मत निकल

संतुलित व्यवहार कर
बन्द तू किवाड़ कर
घर में बैठ, इतना भी तू ना मचल
मत निकल, मत निकल, मत निकल
अनुरोध कि जन चेतना हेतु जब तक यह दावानल थम न जाए, पंक्तियों को अग्रसारित करें।।।।
🌹👏🌹
किसी ने अच्छा लिखा है —
विनोद कुमार द्वारा प्रेषित

************

🙂🙂😃
  Latest in the series for prevention of Corona  दि.२०-०९-२०२०
 
 
 
 *नवीन दोहे.!*
 
 *रहीमदास*
रहिमन घर से जब चलो, रखियो मास्क लगाए
ना जाने किस वेश में मिलने कोरोना आए
 
*कबीरदास*
कबीरा काढा पीजिए, काली मिरिच मिलाय
रात दूध हल्दी पियो, सुबह पीजिए चाय
 
*तुलसीदास*
छोटा सेनिटाइजर तुलसी रखिए जेब,
न काहूँ सो मागिहो, न काहूँ को देब,
 
*सूरदास*
सूरदास घर मे रहो, ये है सबसे बेस्ट,
जर, जुकाम, सर्दी लगे, तुरंत करालो टेस्ट ।
 
*मलूकदास*
बिस्तर पर लेटे रहो सुबह शाम दिन रात,
एक तो रोग भयंकरा, ऊपर से बरसात।
 
रहिमन वैक्सीन ढूंढिए,
बिन वैक्सीन सब सून,
वैक्सीन बिना ही बीत गए,
अप्रैल मई और जून…
 
😀🤫😀😀🤫
कबीर वैक्सीन ढुंढ लिया
       धीरज धरो तनिक तुम !
ट्रायल फायनल चल रहा ,
          वैक्सीन कमिंग सून !!
 
🤣🤣🤣🤣
 
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१. जिंदगी की अजीब कशमकश

*ज़िन्दगी कशमकश के अजीब दौर से फिर गुज़र रही हैं,
यह sixty + भी कुछ Teenage सी लग रही रही हैं।*

हार्मोनल लहरों ने जवानी की दहलीज़ पर ला पटका था,
उफ़ ! तन और मन कैसे उन मनोस्थितियों से निपटा था !

जल्दी बड़े दिखने की चाहत में कितने जतन करते थे,
अब बड़े न दिखे, की चाहत में कितने जतन करते हैं !

तब भी सुना था बड़े हो चले हो, अब थोड़ा ढंग से पेश आया करो,
अब सुनता हूँ, साठ के हो चले हो, कुछ तो शर्म खाया करो!

अब कम्बख़्त, जवानी भी अलविदा कह जान छुड़ाना चाहती हैं,
रँगे बालों की जाती रंगत, रह रह कर बदहवासी आईने में दिखाती हैं !

वक़्त सीमित है, जानता हर कोई है, पर मानना नहीं चाहता,
बस अंधी दौड़ में शामिल रह कर दिल को है बहलाता !

काश कि हम सब Expiry डेट के साथ इस दुनिया में आते,
ज़िन्दगी को जीने और एक दूसरे की अहमियत के मायने ही बदल जाते !

सूरत बदल जाएगी, उम्र ढल जाएगी, खर्च हो कर साँसे सिमट जाएँगी,
पर मेरे दिल की जवानी पूरे भरोसे के साथ अंत तक मेरा साथ निभाएगी !

फिलहाल ज़िन्दगी कशमकश के अजीब दौर से गुज़र रही है,
यह sixty + भी कुछ Teenage सी लग रही रही हैं !!
●◆●◆●

*(साठ के आसपास और साठ से उपर या उसके नजदीक की उम्रवाले दोस्तों को समर्पित)*
🙏

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२. आज का मोबाइल सच

आज का सत्य
🌀नींद आँखे बंद करने से नही Net बंद करने से आती है..!!…
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🌀पहले लोग ‘बेटा‘ के लिये तरसते थे.. और आजकल डेटा के लिये !
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🌀आज की सबसे बड़ी दुविधा…..मोबाइल बिगड़ जाये तो बच्चे जिम्मेदार, और बच्चे बिगड़ जाये तो मोबाइल जिम्मेदार….
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🌀” बदल गया है जमाना पहले माँ का पैर छू कर निकलते थे, अब मोबाइल की बॅटरी फुल करके निकलते है 😂😝
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🌀कुछ लोग जब रात को अचानक फोन का बैलेंस ख़त्म हो जाता है इतना परेशान हो जाते हैं माने जैसे सुबह तक वो इन्सान जिंदा ही नहीं रहेगा जिससे बात करनी थी।
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🌀 कुछ लोग जब फ़ोन की बैटरी 1-2% हो तो चार्जर की तरफ ऐसे भागते है जैसे उससे कह रहे हो “तुझे कुछ नहीं होगा भाई ! आँखे बंद मत करना मैं हूँ न ! सब ठीक हो जायेगा।😳😳😳
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🌀कुछ लोग अपने फोन में ऐसे पैटर्न लॉक लगाते हैं जैस ISI की सारी गुप्त फाइलें उनके फ़ोन में ही पड़ी हो।😉😜😜😜
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🌀गलती से फ़ोन किसी दुसरे दोस्त के यहाँ छुट जाए तो ऐसा महसूस होता हैं जैसे अपनी भोली-भाली गर्लफ्रेंड को शक्ति कपूर के पास छोड़ आये हो।
😃😜😂
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😆😆😆😆😆😂😂😜

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३. चारुचंद्र की चंचल किरणें

कवि : मैथिलीशरण गुप्त

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर-वीर निर्भीकमना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥

किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!

मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।
वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥

कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!

है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।

सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥

तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,
वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की।
किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!

और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,
व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।
कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!
– ——– मैथिलीशरण गुप्त

…………….

३. चारु चंद्र की चंचल चितवन

माय फेअर लेडी हा सिनेमा आणि ती फुलराणी हे मराठी नाटक जॉर्ज बर्नाड शॉ यांच्या ज्या पिग्मॅलियन नाटकावर आधारलेले होते त्याचप्रमाणे मनपसंद हा सिनेमासुद्धा याच नाटकावर आधारलेला होता. त्यात सुंदर आणि अनुप्रासपूर्ण हिंदी भाषेसाठी चारु चंद्र की चंचल चितवन बिन बदरा बरसे सावन असे काव्य घेतले आहे आणि त्याला शास्त्रीय संगीताची जोड दिली आहे
Charu Chandra Ki Chanchal Chitwan : Man Pasand (1980) was a film with Dev Anand and Tina Munim in lead roles. It was produced by Amit Khanna, who also wrote the lyrics. The film was directed by Basu Chatterjee. Girish Karnad also played a major role.The film was dedicated to George Bernad Shaw, and is inspired by his play Pygmalion and the film My Fair Lady (which was also based on George Bernad Shaw’s play). Music was by Rajesh Roshan. This song has playback by Kishore Kumar and Lata Mangeshkar.

सा रे ग म प म ग रे सा, गाओ
सा रे ग म प म ग रे सा
सा रे ग म प म ग रे सा ग, सा ग, फिर से गाओ
सा रे ग म प म ग रे सा ग, सा ग
शाब्बास!

सा रे ग म प म ग रे सा ग, सा ग
रे ग म प म ग रे स, रे प, रे प
प ध नी स नी ध प म, म ध, ग ध प, नी स

आवाज़ सुरीली का, जादू ही निराला है
संगीत का जो प्रेमी, वो किस्मत वाला है
तेरे-मेरे, मेरे-तेरे सपने-सपने
सच हुए देखो सारे अपने-सपने
फिर मेरा मन ये बोला, बोला, बोला
क्या?
सा रे ग म प म ग रे…

चारु चंद्र की चंचल चितवन बिन बदरा बरसे सावन
मेघ मल्हार मधुर मन भावन पवन पिया प्रेमी पावन
चल, चाँद-सितारों को, ये गीत सुनाते हैं
हम धूम मचाकर आज, सोया जहां जगाते हैं
हम-तुम, तुम-हम गुमसुम-गुमसुम
झिलमिल-झिलमिल, हिलमिल-हिलमिल
तू मोती मैं माला, माला, ला ला

अरमान भरे दिल की धड़कन भी बधाई दे
अब धुन मेरे जीवन की कुछ सुर में सुनाई दे
रिमझिम-रिमझिम, छमछम-गुनगुन
तिल-तिल, पल-पल, रुमझुम-रुमझुम
मनमंदिर में पूजा, पूजा, आहा
सा रे ग म प म ग रे…
——————————————–

४. झाँकी ये विज्ञान की

Science Poem by vivek singh
– वॉट्सॅपवरून साभार

विज्ञानदिनानिमित्य श्री विवेकसिंह यांनी लिहिलेल्या या कवितेला चालीत बसवण्याच्या दृष्टीने मी त्यात काही  किरकोळ बदल केले आहेत.

आओ बच्चों तुम्हें दिखाए, झाँकी ये विज्ञान की
न्यूटन के गति और ग्राहम बेल के एक टेलीफोन की।

एडिसन ने बल्ब को खोजा वही प्रकाश का राज है,
वेवेज ने कंप्यूटर खोजा, तकनीकी सम्राट है।

देखो ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की,
आओ बच्चों तुम्हें दिखाए, झांकी ये विज्ञान की।

देखों अपने बॉयल, चार्ल्स के ताप-दाब संबंधों को,
इसने सारा जीवन काटा खोजो और प्रयोगों पे।

ये है अपना प्रोटान देखो नाज इसे रेडफोर्ड पे,
इलेक्ट्रान को थॉमसन और न्यूट्रॉन को चैडविक पे।

देखो ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की,
आओ बच्चों तुम्हें दिखाए, झांकी ये विज्ञान की।

देखों मिट्टी का उपजाऊ वोहलर का यूरिया था,
उगल रही है कण कण से बंजर भूमि का सोना था।

टेलिस्कोप नाम था मुट्ठी में यह सारा ब्रम्हांड था,
बोली हर-हर गैलीलियो की बच्चा-बच्चा बोला था।

देखो ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की,
आओ बच्चों तुम्हें दिखाए, झांकी ये विज्ञान की।

अलेक्जेंडर फ्लेमिंग आए पेनिसिलीन से घाव भराये,
आनुवांशिकी का दान कर लो मेण्डल का सम्मान।

एक्स किरण है मैक्स प्लांक के मेहनत का इनाम,
सरल जीव से सॄष्टि आयी हो गया डार्विन का नाम।

देखो ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की,
आओ बच्चों तुम्हें दिखाए, झांकी ये विज्ञान की।

देखि रेडियो मारकोनी का, मन उमंग से भरा सभी का,
हरगोविंद खुराना तोहफा लाये अपने कृत्रिम जीन का।

विज्ञान प्रगति का है सपना ज्ञान हो विज्ञान का,
सब पढ़े सब बढ़े नाम हो भारत देश का।

यहां वैज्ञानिकों ने लगा दी बाजी अपने जान की,
आओ बच्चों तुम्हें दिखाए, झांकी ये विज्ञान की।

●◆●◆●●◆●◆●●◆●◆●●◆●◆●●◆●◆●

५. … बहुत हैं

वक्त पे न पहचाने कोई , ये अलग बात हे,
वैसे तो शहर में अपनी , पहचान बहुत हैं।

खुशियां कम, और अरमान बहुत हैं,
जिसे भी देखिए यहां , हैरान बहुत हैं।

करीब से देखा तो, है रेत का घर,
दूर से मगर उसकी , शान बहुत हैं,

कहते हैं, सच का कोई सानी नहीं,
आज तो झूठ की, आन-बान बहुत हैं।

मुश्किल से मिलता है , शहर में आदमी,
यूं तो कहने को, इन्सान बहुत हैं।

तुम शौक से चलो , राहें-वफा लेकिन,
जरा संभल के चलना , तूफान बहुत हैं।

वक्त पे न पहचाने कोई , ये अलग बात हे,
वैसे तो शहर में अपनी , पहचान बहुत हैं।

….. दि.२०-०४-२०१९

 

६. शराब

🥃 🥃
*मुझे शराब से महोब्बत नही है*
*महोब्बत तो उन पलो से है*
*जो शराब के बहाने मैं*
*दोस्तो के साथ बिताता हूँ.*

🥃🥃
*शराब* तो ख्वामखाह ही बदनाम है..
नज़र घुमा कर देख लो..
इस दुनिया में..
*शक्कर* से मरने वालों की तादाद बेशुमार हैं!
🥃🥃
तौहीन ना कर शराब को कड़वा कह कर,
*जिंदगी के तजुर्बे,* शराब से भी कड़वे होते है…

🥃🥃
कर दो तब्दील *अदालतों* को *मयखानों* में साहब;
सुना है नशे में कोई झूठ नहीं बोलता !
🥃🥃
सबसे कड़वी चीज़ इन्सान की *ज़ुबान* है,
*दारू और करेला*, तो खामखां बदनाम हैं !

🥃🥃🥃🥃🥃🥃🥃

“बर्फ का वो शरीफ टुकड़ा जाम में क्या गिरा… बदनाम हो गया…”

“देता जब तक अपनी सफाई… वो खुद शराब हो गया…..”

*ताल्लुकात बढ़ाने हैं तो….*
*कुछ आदतें बुरी भी सीख ले गालिब,*

*ऐब न हों तो…..*
*लोग महफ़िलों में नहीं बुलाते ….*
🥃🥃🥃🥃
🤣🤣🤣🤣
—    दि. २२-०५-२०१९

…………

७ तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी

बहुत ही सुंदर गीत ❤️

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी
हैरान हूँ मैं
तेरे मासूम सवालों से
परेशान हूँ मैं

जीने के लिए सोचा ही नहीं
दर्द संभालने होंगे
मुस्कुराये तो मुस्कुराने के
क़र्ज़ उतारने होंगे
मुस्कुराऊं कभी तो लगता है
जैसे होंठों पे क़र्ज़ रखा है
तुझसे…

ज़िन्दगी तेरे गम ने हमें
रिश्ते नए समझाए
मिले जो हमें धूप में मिले
छाँव के ठण्डे साये
तुझसे…

आज अगर भर आई है
बूंदे बरस जाएगी
कल क्या पता किनके लिए
आँखें तरस जाएगी
जाने कब गुम हुआ, कहाँ खोया
इक आंसू छुपा के रखा था
तुझसे…

Movie/Album: मासूम (1983)
Music By: आर.डी.बर्मन
Lyrics By: गुलज़ार
Performed By: लता मंगेशकर

                दि.२५-०५-२०१९


०८ चार का चमत्कार

हम भारतीयों के जीवन में 4 नंबर का बहुत महत्व है, जैसे

🌹4 दिन की चांदनी और फिर अंधेरी रात है🌌 😎

🌹4 किताबें📚 पढ़ क्या लीं खुद को गवर्नर समझता है😎😄😄
🌹4 पैसे 💵 कमाओगे तब पता चलेगा।😎⭐
🌹4-4 पैसे में बिकती है आज के दौर में ईमानदारी😎⭐⭐
🌹आखिर हमारी भी 4 लोगों में कोई इज्जत है😎⭐⭐
🌹यह बात 4 लोग सुनेंगे तो क्या सोचेंगे।😎⭐
🌹4 दिनों की आई हुई बहू👰 के ऐसे तेवर😎⭐⭐
🌹4 दिन तो दुकान में टिक कर बैठ जाओ😎⭐
🌹वो आई और 4 बातें सुनाकर चली💃गई 😎⭐⭐
🌹तुमसे क्या 4 कदम 🏃भी नहीं चला जाता 😎
⭐⭐⭐ आंखे 4 हो गयी
⭐⭐⭐⭐⭐⭐ 4 चाँद लगा दिए
☀☀☀☀☀☀

और Last में
😜😝😝🌹4 बोतल Vodka🍸काम मेरा रोज का….

😎इतना ही नहीं
🤠अंत में 4 लोगों के कंधे पर जाना भी है।🤓😜😂😂😂
😍अब ज़रा 4 मिनट का समय निकल कर 4 लोगों को जरूर भेजें , क्योंकि
😇4 Log पढ़ेंगे तो कम से कम
🌹4 पल के लिए ही सही मुस्कुराएंगे तो ज़रूर 😍😜😝😝 .

                 दि. ०२ जून २०१९

⭐⭐⭐⭐⭐  ⭐⭐⭐⭐⭐  ⭐⭐⭐⭐⭐  ⭐⭐⭐⭐⭐

 ०९ एक से दस का महिमा

(वेद , पुराण व अन्य धर्म ग्रंथों की प्रमाणिकता के आधार पर )
कुछ जानकारियाँ ऐसी भी :-

एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति’।

दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी।
दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।

तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
तीन स्थिति : ठोस, द्रव, गैस।
तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।
तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।
तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।

चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।
चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।
चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।
चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।

पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।

छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच), मोह, आलस्य।

सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।
सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।
सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।
सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।
सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।
सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।
सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।
सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।
सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।
सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।

आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।
आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।
आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।
आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।
आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।

नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।
नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।
नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।

दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।
दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।
दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।
दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।

    .  . . .  . . . . . .  .. . . वॉट्सॅपवरून साभार  दि.०५ जून २०१९

 

१० वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

मुहल्ले की सबसे निशानी पुरानी
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी
वो नानी की बातों में परियों का डेरा
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई
वो छोटी सी रातें वो लम्बी कहानी

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना
वो गुड़िया की शादी में लड़ना झगड़ना
वो झूलों से गिरना वो गिर के सम्भलना
वो पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफ़े
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरौंदे बनाना बनाके मिटाना
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी
वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी
न दुनिया का ग़म था न रिश्तों के बंधन
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िंदगानी

वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

गायक : जगजितसिंग
गीतकार : सुदर्शन फकीर
फिल्म : आज


११. गुलजारसाहबकी कुछ अनमोल पंक्तियाँ

 Gulzar Quotes1

Gulzar Quotes 2

वॉट्सअॅपसे धन्यवादसहित दि. २१-१०-२०१९


१२. ये जिंदगी है यारों

गुलज़ार ने कितनी खूबसूरती से बता दिया जिंदगी क्या है।

-कभी तानों में कटेगी,
कभी तारीफों में;
ये जिंदगी है यारों,
पल पल घटेगी !!
-पाने को कुछ नहीं,
ले जाने को कुछ नहीं;
फिर भी क्यों चिंता करते हो,
इससे सिर्फ खूबसूरती घटेगी,
ये जिंदगी है यारों पल-पल घटेगी !
-बार बार रफू करता रहता हूँ,
…जिन्दगी की जेब !!
कम्बखत फिर भी,
निकल जाते हैं…,
खुशियों के कुछ लम्हें !!

-ज़िन्दगी में सारा झगड़ा ही…
ख़्वाहिशों का है !!
ना तो किसी को गम चाहिए,
ना ही किसी को कम चाहिए !!

-खटखटाते रहिए दरवाजा…,
एक दूसरे के मन का;
मुलाकातें ना सही,
आहटें आती रहनी चाहिए !!

-उड़ जाएंगे एक दिन …,
तस्वीर से रंगों की तरह !
हम वक्त की टहनी पर…,
बेठे हैं परिंदों की तरह !!

-बोली बता देती है,इंसान कैसा है!
बहस बता देती है, ज्ञान कैसा है!
घमण्ड बता देता है, कितना पैसा है !
संस्कार बता देते है, परिवार कैसा है !!

-ना राज़* है… “ज़िन्दगी”,
ना नाराज़ है… “ज़िन्दगी”;
बस जो है, वो आज है, ज़िन्दगी!

-जीवन की किताबों पर,
बेशक नया कवर चढ़ाइये;
पर…बिखरे पन्नों को,
पहले प्यार से चिपकाइये !!

वॉट्सअॅपसे धन्यवादसहित दि. २२-११-२०१९


१३. कुछ चुटकुले

इस दुनियामें एक पानवालाही सच्चा इनसान है जो पूछकर चूना लगाता है ।

नजरका ऑपरेशन तो पॉसिबल है, मगर नजरियेका नही ।

हम इंडियन्सके पास हर प्रॉब्लेम का सोल्यूशन है, बस प्रॉब्लेम अपना नही होना चाहिये ।

मोटापा सबसे वफादार है, एक बार आ गया तो जिंदगीभर साथ निभाता है ।

लडकियाँ सिर्फ किचनमे अच्छी लगती हैं और ऐसी सोच रखनेवाले कबरमें।

लोग हमारे बारेमें क्या सोचते है यह भी हम ही सोचेंगे तो लोग क्या सोचेंगे ?

एक चीज जो कभी लडकियोंकी नही होती …. गलती

पता नही लोगोंको सच्चा प्यार कैसे मिल जाता है, मुझ तो सेलोटेपका एंडभी नही मिलता ।

डर लगता है उन लोकोंसे जिनके दिलमेंभी दिमाग होता है।

अपनी खूबसूरतीपर घमंड होता है तो अपनी आधार कार्डकी फोटो देख लें।

जिंदगी औरभी अच्छी होती अगर सभी दुखदर्द मेड इन चायना होते ।

जिन्हे लगता है बस अधूरी मोहब्बतही दर्द देती है, कभी धूपमें खडी बाइकपर बैठके देखें।

दस रुपयेकी कीमत वॅलेटमें नही, मोबाइलमें समझ आती है।

पत्नी : पहले मेरा फिगर पेप्सीकी बोटलजैसे था।
पति : वो तो अभी भी है।
पत्नी : सचमें ?
पति : हाँ, पहले ३०० एमएल की बोटल थी, अब दो लिटरकी है।

पानीमें बैठी भैंस और मेक अप करने बैठी लडकी कभी जल्दी उठती नही ।

जो लोग एटीएमसे निकले पैसे गिनते हैं , वो किसीपे ट्रस्ट नही करते ।

३ चीजें किस्मतवालोंकोही मिलती हैं, १-सच्चा प्यार, २- सच्चा दोस्त और ३- अपने कामसे काम रखनेवाले रिश्तेदार ।

किसी चीजको सच्चे दिलसे चाहो तो सारी कायनात तुम्हारी वाट लगानेमें लग जाती है।

शादी में दुलहनका एक्स बॉयफ्रेंड आया, लडकीके पिताने पूछा, “आप कौन है?”
उसने कहा , “मैं सेमिफायनलमें बाहर हो गया था, अब फायनल देखने आया हूँ।”

सवाल : अरेंज्ड मॅरेजमें डायव्होर्स कम क्यों होते हैं ?
जवाब : जो अपनी मरजीसे शादी नही कर पाया वो डायव्होर्स क्या खाक लेगा ?

अॅलार्म बंद करनेके बाद जो नींद आती है वो नींद रातमें भी नही आती है।

छोटा बच्चा अपनी माँसे,” माँ, मैं इतना बडा कब बन जाऊँगा कि आपसे पूछे बिना हर जगह चला जाऊँ ?”
माँ बहुत प्यारसे, “बेटा, इतना बडा तो तेरा बापभी नही हुवा अबतक। “

अरे इसकी क्या जरूरत थी ? Indian version of Thank you.

Govt. Bus = No सरकारी बस = नही
Govt. school = No सरकारी पाठशाला = नही
Govt. Hospital = No सरकारी अस्पताल = नही
Govt. job = Yes सरकारी नौकरी = हाँ भई हाँ

Elder sibling in other countries : To Help, To Protect, To Love
अन्य देशोंमे बडा भाई : मदद, रक्षा, प्यार के लिये
In India : Paani Lao, Remote Lao, Gate Kholo, Roomka Door Band Karo.
भारत में :पानी लाओ, रिमोट लाओ, गेट खोलो, रूमका दरवाजा बंद करो

Life of a Doctor
– Become a Doctor, – Marry a Doctor – Have kids – Make kids Doctor – Find Doctor Rishta for kids – Die
डॉक्टरका जीवन : डॉक्टर बनो, डॉक्टरसे शादी करो, बच्चे पैदा करो, उनको डॉक्टर बनाओ, उनके लिये डॉक्टर रिश्ता लाओ, मर जाओ

Shortest Horror story
” Tumhare liye Rishte Aaye hain”
सबसे छोटी खौफनाक कहानी : “तुम्हारे लिये रिश्ते आये है।”
Q: What is the National Food of India? भारतका राष्ट्रीय खाद्य
A: Kasam कसम

ये पॉसिबल नही है, वरना हम इंडियन्स टूथपेस्टकी तरह गॅस सिलिंडरकोभी दबा दबाकर गॅस निकाल लें ।

  • – – – – – – – – – –

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