अटलबिहारी वाजपेयीजी यांच्या कविता

अटलजी
२५ डिसेंबर २०१८: कवी असूनही कणखर, राजकारणी असूनही अजातशत्रू आणि सर्वांचे लाडके असलेले माननीय अटलबिहारी वाजपेयीजी यांचा आज जन्मदिवस
भारताच्या संसदेतील उगवता तारा अशी अटलजींची ओळख कै पंडित नेहरू यांनी अमेरिकन शिष्टमंडळाला करून दिली होती .
वक्ता दश सह्स्त्रेषु ही म्हण त्यांनी सार्थ केली. ओघवती वाणी, उपमा अलंकार यांचा सुंदर वापर, मर्मविनोदी जिव्हारी न लागणारी टीका ही तर त्यांची खासियत होती.
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दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
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वाजपेयी आओ फिरसे

– दि.०९-०७-२०१९

अटलजी आओ फिरसे

  • दि.१९-०९-२०२०

कैसा हो घर का वास्तु
स्वर्गीय अटल जी की ज़ुबानी – 👍

घर चाहे कैसा भी हो.. उसके एक कोने में..

खुलकर हंसने की जगह रखना..

सूरज कितना भी दूर हो..

उसको घर आने का रास्ता देना..

कभी कभी छत पर चढ़कर..

तारे अवश्य गिनना..

हो सके तो हाथ बढ़ा कर..

चाँद को छूने की कोशिश करना .

अगर हो लोगों से मिलना जुलना..

तो घर के पास पड़ोस ज़रूर रखना..

भीगने देना बारिश में..

उछल कूद भी करने देना..

हो सके तो बच्चों को..

एक कागज़ की किश्ती चलाने देना..

कभी हो फुरसत,आसमान भी साफ हो..

तो एक पतंग आसमान में चढ़ाना..

हो सके तो एक छोटा सा पेंच भी लड़ाना..

घर के सामने रखना एक पेड़..

उस पर बैठे पक्षियों की बातें अवश्य सुनना..

घर चाहे कैसा भी हो..  घर के एक कोने में..

खुलकर हँसने की जगह रखना.

चाहे जिधर से गुज़रिये

मीठी सी हलचल मचा दिजिये,

उम्र का हरेक दौर मज़ेदार है
अपनी उम्र का मज़ा लिजिये.

ज़िंदा दिल रहिए जनाब,

ये चेहरे पे उदासी कैसी
वक्त तो बीत ही रहा है,

उम्र की ऐसी की तैसी…!¡!

🔶— Atal Bihari Vajpayee

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25 डीसेम्बर…
श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयीजी का जन्म दिन…
उनकी पावन आत्मा को सादर नमन…
उन्हों अपना सारा जीवन भारत माता की सेवा में समर्पित कर दिया था…
भारत माता का भव्य-दिव्य वर्णन अटलजीने किया है वह उन्हीं के शब्दों में प्रस्तुत है…
~~🇮🇳~🇮🇳~~~
भारतमाता की जय!
• अटल बिहारी वाजपेयी

भारत जमीन का टुकडा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय इसका मस्तक है,
गौरीशंकर शिखा है।
कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल दो कंधे है।
विन्धाचल कटि है, नर्मदा करधनी है।
पूर्वी और पश्चिमी घाट,
दो विशाल जंघाएँ है।
कन्याकुमारी इसके चरण है,
सागर इसके पग पखारता है।
पावस के काले-काले मेघ
इसके कुंतल केश हैं।
चाँद और सूरज इसकी आरती उतारते हैं।
यह वंदन की भूमि है,
अभिनंदन की भूमि है।
यह तर्पण की भूमि है,
यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिंदु-बिंदु गंगाजल है।
हम जिएँगे तो इसके लिए,
मरेंगे तो इसके लिए।
मरने के बाद भी गंगाजल में बहती हुई
हमारी अस्थियों को कोई
कान लगाकर सूनेगा तो
एक ही आवाज आयेंगी-
भारतमाता की जय🚩🚩🚩

🙏🏻🚩🇮🇳🔱🏹🐚🕉

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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी  न सिर्फ प्रखर राजनेता और ओजस्‍वी वक्‍ता थे बल्‍कि कलम के जादूगर भी थे. उन्‍होंने एक से बढ़कर एक कई कविताएं लिखीं. भारत रत्‍न अटल बिहारी वाजपेयी इन कविताओं का इस्‍तेमाल अपने भाषणों में भी खूब करते थे. जनता ने जितना प्‍यार और सम्‍मान उन्‍हें बतौर पीएम और नेता के रूप में दिया उतना ही सम्‍मान उनकी कविताओं को भी मिला. उनकी कविताएं महज चंद पंक्तियां नहीं बल्‍कि जीवन का नजरिया हैं, समाज के ताने-बाने के साथ आगे चलने की प्रेरणा हैं और घोर निराशा में भी आशा की किरणें भरने वाली हैं. यहां पर जानिए अटल बिहारी वाजपेयी की ऐसी ही मशहूर 6 कविताएं:

1. उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा.
कदम मिलाकर चलना होगा.

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढलना होगा.
कदम मिलाकर चलना होगा.

कुछ कांटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा.
क़दम मिलाकर चलना होगा.

2. हरी हरी दूब पर
ओस की बूंदे
अभी थी,
अभी नहीं हैं|
ऐसी खुशियां
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थी,
कहीं नहीं हैं|

क्‍कांयर की कोख से
फूटा बाल सूर्य,
जब पूरब की गोद में
पाँव फैलाने लगा,
तो मेरी बगीची का
पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूं
या उसके ताप से भाप बनी,
ओस की बूंदों को ढूंढूं?

Atal Bihari Vajpayee Quotes: ‘छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता’

सूर्य एक सत्य है
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊं?
कण-कण में बिखरे सौन्दर्य को पिऊं?

सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की
हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूंद
हर मौसम में नहीं मिलेगी।

3. खून क्यों सफेद हो गया?

भेद में अभेद खो गया.
बंट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.

खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है.
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई.

अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता.
बात बनाएं, बिगड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.

4. क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी।

जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे।
चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे।

5. कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है|
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है|
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|

6. ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूं?

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।

टिप्पणियां
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफां का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई!

भारतीय राजनीति के इस महान योद्धा को हमारा नमन.


टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

…………………….. नवी भर दि.१६-०८-२०१९


कविता अटलजींची आहे, अतिशय सुंदर …..
आयुष्यभर तात्विकतेने जगलेला आणि कवितेतुन व्यक्त होणारा, मनात प्रचंड राष्ट्रप्रेम असलेला असा हा माणुस……
विरक्त पण विलक्षण इच्छाशक्ति आहे त्यांच्याकडे……
आणि त्यांच्या कवितेतल्या शब्दांमधुन ती सतत दिसते.
दीपावली च्या मन:पुर्वक शुभेच्छा 💐💐       ….  नवी भर दि.२८-१०-२०१९

दिवाली

जब मन में हो मौज बहारों की
चमकाएँ चमक सितारों की,
जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों
तन्हाई में भी मेले हों,
आनंद की आभा होती है
उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है ।

जब प्रेम के दीपक जलते हों
सपने जब सच में बदलते हों,
मन में हो मधुरता भावों की
जब लहके फ़सलें चावों की,
उत्साह की आभा होती है
उस रोज़ दिवाली होती है ।

जब प्रेम से मीत बुलाते हों
दुश्मन भी गले लगाते हों,
जब कहींं किसी से वैर न हो
सब अपने हों, कोई ग़ैर न हो,
अपनत्व की आभा होती है
उस रोज़ दिवाली होती है ।

जब तन-मन-जीवन सज जाएं
सद्-भाव के बाजे बज जाएं,
महकाए ख़ुशबू ख़ुशियों की
मुस्काएं चंदनिया सुधियों की,
तृप्ति की आभा होती है
उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है .। –

–अटलबिहारी वाजपेयी

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माननीय अटलजींनी स्वातंत्र्यवीर सावरकरांविषयी असे लिहिले आहे :

सावरकर म्हणजे तेज..
सावरकर म्हणजे त्याग..
सावरकर म्हणजे तप…
सावरकर म्हणजे तत्व..
सावरकर म्हणजे तर्क..
सावरकर म्हणजे तारुण्य..
सावरकर म्हणजे तीर..
सावरकर म्हणजे तलवार..
सावरकर म्हणजे तिलमिलाहट..
सावरकर म्हणजे तितिक्षा..
सावरकर म्हणजे तिखटपणा..

— अटलबिहारी वाजपेयी.


नवी भर दि.२५-१२-२०१९

Atal Poem

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नवी भर दि.२५-१२-२०२०